देश की राजनीति में युवाओं और खासकर Gen-Z की भूमिका लगातार बढ़ रही है। हाल के दिनों में शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा प्रणाली और पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर छात्रों और युवाओं में नाराजगी देखने को मिली है। इन मुद्दों ने सरकार के सामने संवाद और जवाबदेही की चुनौती खड़ी कर दी है। सोनम वांगचुक के 26 दिनों के अनशन और उसके बाद सरकार की ओर से मिले लिखित आश्वासन ने इस बहस को और तेज कर दिया है। वांगचुक ने कहा कि सरकार ने परीक्षा व्यवस्था में सुधार, पेपर लीक से प्रभावित परिवारों को सहायता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों पर कार्रवाई नहीं करने को लेकर भरोसा दिया है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आज का युवा वर्ग पहले से ज्यादा जागरूक है और सोशल मीडिया के जरिए अपनी आवाज तेजी से उठाता है। Instagram, YouTube और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म ने युवाओं को अपनी समस्याएं सीधे सामने रखने का एक नया माध्यम दिया है। यही कारण है कि शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे अब सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चर्चा का हिस्सा बन जाते हैं। हालांकि, इसे केवल सरकार की हार या किसी एक राजनीतिक पक्ष की जीत के रूप में देखना आसान नहीं होगा। लोकतंत्र में सरकारों को समय-समय पर जनता की चिंताओं का जवाब देना पड़ता है। संवाद और समाधान की प्रक्रिया किसी भी व्यवस्था को मजबूत बनाती है।
फिलहाल, यह साफ है कि Gen-Z का राजनीतिक प्रभाव बढ़ रहा है। युवा अब सिर्फ चुनाव के समय नहीं, बल्कि नीतियों और फैसलों पर भी अपनी राय रखना चाहते हैं। आने वाले समय में शिक्षा, रोजगार और पारदर्शिता जैसे मुद्दे राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह कहना जल्दबाजी होगी कि कोई सरकार युवाओं से हार गई है, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि युवाओं की आवाज को नजरअंदाज करना अब पहले से ज्यादा मुश्किल हो गया है।
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